बेटी मेरा अभिमान को लेकर कुछ पंक्तियां गुन रही थी । हर दिन एक नया मोड़ देने की लालसा में दिन रात जग रही थी। पिरो ली थी जब मैंने लिखने की वो हर बात अपनी उसी समय अचानक एक जघन्य वारदात फिर घट चुकी थी । क्या हुआ , क्या नहीं , पर हालात उसके सब बयां कर रहे थे । फिर भी न जाने क्यों मौन ने अपनी एक जगह बना ली थी। राजनीति है या सच्चाई या मन का बुना कोई फसाना पर एक बेटी की इस तरह की विदाई के लिए मां बाप बेटी का अभिमान न बन सके। उसके तुरंत बाद दो और घटनाएं और आ चुकीं थीं।क्या बीती होगी उन पर जब अपनी आंखों के सामने लावारिश सा अंतिम संस्कार देखा होगा। क्या बीती होगी उस हर बेटी के मां बाप पर जो आज भी अपनी बेटियों को पढ़ा रहे हैं और बचाने की जद्दोजहद में भी लगे हैं।बेटियों को जातिवाद से मत जोड़िए जिन्हें बचपन से ही पराए घर का समझा जाता है और फिर शादी के बाद भी यह एहसास कराया जाता है कि तुम दूसरे घर से आई हो । तो फिर आज एक बेटी की हत्या को आप जाति से कैसे जोड़ सकते हो जबकि उसका कोई घर ही नहीं होता तो धर्म और जाति की फिर बात ही क्यूं की जा रही है।खैर इंसाफ से परिवार के लिए बेटी की कमी पूरी नहीं हो सकती लेकिन जिसने गलत किया है उन्हें सजा जरूर मिलनी चाहिए। जो लोग मां बाप को ग़लत ठहराते हैं समझ लीजिए यूं ही बेटियों पर अंकुश नहीं लगाए जाते जब चुनौती हो सामने तो मजबूरन खुद को ही आगे बढ़ना पड़ता है।अगर मां बाप अंकुश लगाएं तो गलत न समझना दौर ही कुछ ऐसा है कि बेटी पढ़ाना भी जरूरी है और बचाना भी जरूरी है।
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आत्मचिंतन (मन की बात )
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