ज्यादा अच्छा होना शायद आज गलत है

आप कहानी समझें या अनैतिक व्यवहार का साझा करना , समझना आपको ही है।
आज कल हम और आप हम सभी जानते हैं कि ट्यूशन पढ़वाना अब कितना आवश्यक हो गया है।

इस दौर में ट्यूशन फीस कहीं ऐसा न हो माता -पिता देने से इंकार कर दें या मनमानी रुपये काट लें , इसी डर से अध्यापकों ने एडवांस पेमेंट लेना स्टार्ट कर‌ दिया। लेकिन आज भी कुछ शिक्षक नहीं चाहते कि एडवांस पेमेंट न दे पाने की वजह से बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाएं। और अपनी इस अच्छाई की वजह से वो महीनें भर बच्चों को पढ़ाते हैं तब जाकर उनको पेमेंट मिलता है।

आज मैं जो कहानी बताने जा रही हूं ये भी एक ऐसे ही अध्यापक की है ।
जो 4 साल तक बच्चों को लगातार पढ़ाते रहे । कभी खुद ट्यूशन के पैसे महीना पूरा होने पर भी नहीं मांगें। जब माता-पिता को याद आ गया उन्होंने खुद से ही दे दिए।लेकिन अब जब लाकडाउन का समय आया तो न‌ तो महीना पूरा हो पाया और न मिले वो रुपए जो महीने के अंत में मिला करते थे। डिजिटल इंडिया हो जाए मुहिम तो चल रही है लेकिन फोलो कितने लोग करते हैं जबकि जरुरत है ऐसा करने की । लेकिन न देने वालों के लिए खुले हैं हजारों बहानों के दरवाजे।

जब खुद से टीचर ने 15 दिन बाद मैसेज करके बोला तो तिलमिला उठे माता -पिता और फिर क्या था फटाक से कॉल किया अध्यापक को ।अध्यापक जानता था कि सवाल-जवाब तो करने पड़ेंगे मेरी मेहनत की कमाई है । बिना रविवार शनिवार देखें इस महीने मैंने 18 दिन तक लगातार पढ़ाया है । उसने तुरंत जो भी जबाव आए सबका जबाव दिया लेकिन जहां बात 18 दिन के पेमेंट की थी वो 12 या 15 दिन के पेमेंट में सिमट के रह गई। 4 साल का घर जैसा व्यवहार चकनाचूर सा हो गया। इस महीने की छुट्टी तो थी नहीं तो बाकी पूरे साल की छुट्टियां गिनवा दी गईं।इस समय जबकि सब बंद है । हम एक भयानक महामारी से लड़ रहे हैं । हजारों लाखों रुपए जहां दानी पुण्यात्मा गरीबों के खाने में खर्च कर रहे हैं वहीं कहां ऐसी तुच्छ मानसिकता। अच्छाई का ये सिला होगा भला कौन जानता था। आशा करती हूं ऐसा और किसी के साथ न हो।





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