कविता (नदी)


नज़ारा स्वच्छ नदी का ।
लुभाता मन सभी का ।
तट बैठूं मैं इसके ,
मिलता सुकूं सदी का।

हिमालय की नदियां,
हैं बारहमासी ।
बने भगवान खुद ही,
जमुना तट वासी।

शिव की जटा से बहती,
गंगा की अमृत धारा।
हरि की पौड़ी घाट का,
दिखता रूप न्यारा ।

ओझल न हो पाएं ,
ऐसे सुंदर नज़ारे।
अपनी एकाग्रता को ,
इनकी स्वच्छता पर लगा दें।

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