लॉकडाउन से टूटा मजदूरों पर कहर

आज सब अपने घरों में हैं सिवाए कोरोना योद्धाओं, जैसे हमारे डॉक्टर्स , पुलिस कर्मी , बैंक कर्मी आदि या फिर प्रवासी मजदूर। लेकिन आज मुझे दर्द उन मज़बूर मजदूरों के लिए हो रहा है जिनके बिना उन घरों का निर्माण मुश्किल है जिन घरों में हम सब रहते हैं।

लेकिन सिर्फ एक  आशियाने का दुख जताना मेरा उद्देश्य नहीं । क्यूंकि उनके लिये आशियाने न पहले कभी थे ,न आज मिलने की उम्मीद है।
दुख तो इस बात का है कि ये मजदूर भूखे प्यासे दर-बदर फिर रहे हैं, जिसकी वजह कोई तो है।
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हर रोज़ सुबह उठकर जैसे ही टीवी पर रिमोट से न्यूज़ चैनल लगाते हैं या मोबाइल उठाकर देखते हैं, तो एक ही खबर दुख से  सराबोर कर देती है फलां जगह पर इतने मजदूर ट्रेन से कट गए या पैदल चलते हुए जा रहे मजदूरों को कोई वाहन टक्कर मार गया या आज ही का केस ले लेते हैं, यूपी औरैय्या के एक गांव में पलायन करने वाले मजदूर चाय पीने के लिए रुके, एक ओर‌ से तेज़ गाड़ी आई और इस घटना ने 24 मजदूरों की जानें ले ली। दिल दहल जाता है उन बेसहारा मजदूरों को ऐसी घटनाओं का शिकार होते देखकर।
अभी भी न जाने कितने मजदूर घर वापसी के लिए पैदल यात्रा कर रहे हैं। हाथों में नन्हें बच्चों को लेकर मां पैदल चलती चली जा रही हैं।

 एक दृश्य तो ऐसा दिखा कि मैं खुद को भावुक होने से रोक ही नहीं पाई। उस वीडियो में एक मजदूर अपने परिवार को लेकर बैलगाड़ी से जा रहा था रास्ते में एक बैल ने दम तोड़ दिया, तो बेचारा खुद उस बैल के स्थान पर लग गया ताकि उसका परिवार घर तक सही सलामत पहुँच सके। 
अगर इन्हें सारी सुविधाएं मिल रही होतीं तो भला कौन चाहता है इस दुनिया में एक जानवर सी जिंदगी जीना । 
एक मां ने अपने बच्चों को सड़क पर ही आशियाना बनाकर सुलाया तो किसी ने रास्ते में बच्चे को जन्म दिया। कितना मजबूर रहा होगा वो पिता और कितनी असहाय रही होगी वो मां । 
   

कभी-कभी ये ऊंचे स्तर के लोग एहसास दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ते कि गरीबों की कीमत होती तो है लेकिन सिर्फ वोट बटोरने में। क्यूंकि इनके जितना कोई मासूम नहीं। हम और आप तो अपने मन की बात छुपा लेते हैं लेकिन इनसे कोई अगर एक बार प्यार से बात करे तो ये अपनी पूरी व्यथा-कथा सुना देते हैं। 
क्या यही अच्छे दिन आने वाले थे। काश ! अगर सही योजना रही होती और एक वार प्रवासी मजदूरों के बारें में पहले सोच विचार कर लिया जाता तो आज दुर्घटना में दुनिया छोड़कर जाने वाले सारे मजदूर भाई-बहन जीवित होते।
ये अगर आज जीवित ही नहीं रहेंगें तो कल के लिए आर्थिक पैकेज और फिर 12 घण्टे की नौकरी का बोझ किस पर डाल सकेंगे आप । 
अभी भी चाहें राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार, दोनों ही इन मासूमों की जिंदगी को बेहतर तरीके से बचाने का विचार कर सकती हैं।

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